कपकोट के किसान ने तिमूर की खेती से दिखाई नई राह, बाजार की कमी बनी सबसे बड़ी चुनौती

उत्तराखण्ड

रमाड़ी गांव के एक किसान ने तिमूर की खेती कर पहाड़ में रोजगार की नई उम्मीद जगाई है। जंगली और आवारा जानवरों से पारंपरिक खेती को बचाना मुश्किल होने के बाद किसान ने तिमूर उत्पादन की ओर कदम बढ़ाया और अब उनकी मेहनत रंग लाने लगी है।

रमाड़ी गांव निवासी बलवंत सिंह कार्की ने संघर्षों के बीच तिमूर की खेती शुरू की। उन्होंने बताया कि शुरुआत में भांगरा (भृंगराज) की खेती की गई, लेकिन बाजार नहीं मिलने के कारण कुछ वर्षों बाद यह काम बंद करना पड़ा। इसके बाद तुलसी और हर्बल तुलसी चाय का उत्पादन शुरू किया गया, मगर उचित बाजार उपलब्ध न होने के कारण इसे भी बंद करना पड़ा।

बलवंत सिंह कार्की के अनुसार वर्ष 2020-21 में ‘हर्बल ह्यूमन संस्था’ और Dabur के सहयोग से तिमूर के पौधे लगाने शुरू किए गए। शुरुआती दौर में कई पौधे नष्ट हो गए, लेकिन लगातार प्रयासों के बाद अब उनके पास 800 से अधिक पौधे हैं, जिनमें करीब 500 पौधों ने फल देना शुरू कर दिया है।

उन्होंने बताया कि वर्ष 2024 में पहली बार उत्पादन मिला, जिससे लगभग 10 हजार रुपये की आय हुई। वहीं वर्ष 2025 में करीब 25 किलो उत्पादन हुआ। मौसम अनुकूल रहने पर इस वर्ष अक्टूबर तक एक कुंतल से अधिक उत्पादन की उम्मीद जताई जा रही है।

तिमूर के बीज का छिलका सबसे महंगा बिकता है। पिछले वर्ष इसकी स्थानीय कीमत करीब 1500 रुपये प्रति किलो रही। इस बार बेहतर गुणवत्ता के कारण अधिक दाम मिलने की संभावना है। तिमूर की पत्तियां और लकड़ी भी बाजार में बिकती हैं। इसका उपयोग दंत मंजन, मसालों और आयुर्वेदिक औषधियों में किया जाता है।

बलवंत सिंह ने बताया कि उनके कार्य से प्रभावित होकर सघन पौधा केंद्र सेलाकुई तकनीकी जानकारी और प्रशिक्षण में सहयोग कर रहा है।

तिमूर के साथ-साथ वह संतरा, आंवला, तेजपत्ता, हरड़, रीठा और पहाड़ी केला भी उगा रहे हैं। उन्होंने पिछले वर्ष संतरे बेचकर करीब 25 हजार रुपये की आय अर्जित की।

हालांकि बलवंत सिंह सरकार की योजनाओं को लेकर निराश भी नजर आए। उनका कहना है कि उत्तराखंड सरकार ने 22 फरवरी 2023 को ‘मिशन तिमरु’ शुरू किया था, लेकिन धरातल पर अब तक इसका कोई विशेष लाभ किसानों को नहीं मिल पाया है। उन्हें उद्यान विभाग से केवल एक पॉलीहाउस और कृषि विभाग से नर्सरी की सहायता मिली है।

उन्होंने बताया कि तकनीकी जानकारी और घेरबाड़ की कमी के कारण अब तक करीब 500 पौधे नष्ट हो चुके हैं। जानकारी के लिए उन्हें यूट्यूब के सीमित संसाधनों का सहारा लेना पड़ रहा है।

बलवंत सिंह का कहना है कि सबसे बड़ी समस्या बाजार की है। जिस तरह कीवी और मछली उत्पादों के लिए बाजार उपलब्ध कराया जा रहा है, उसी तरह अन्य पर्वतीय उत्पादों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि सरकार ने 13 दिसंबर 2025 को Dabur के साथ एमओयू भी किया, लेकिन अब तक इसका लाभ किसानों तक नहीं पहुंच पाया है।

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उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि यदि बाजार नहीं मिला तो यह काम भी बंद करना पड़ सकता है। ऐसे में पहाड़ के लोगों के सामने पलायन के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचेगा।

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